जानें आखिर क्यों कार्डियोवैस्कुलर डिजीजेज के शिकार अधिक बन रहे हैं युवा, ये हैं बचाव के उपाय

जानें आखिर क्यों कार्डियोवैस्कुलर डिजीजेज के शिकार अधिक बन रहे हैं युवा, ये हैं बचाव के उपाय

PUBLISHED : Sep 13 , 8:38 AMBookmark and Share

जानें आखिर क्यों कार्डियोवैस्कुलर डिजीजेज के शिकार अधिक बन रहे हैं युवा, ये हैं बचाव के उपाय

बड़ी संख्या में लोग हैं, जो सीवीडी यानी रक्तसंचारी तंत्र के रोगों और हृदय रोगों को एक मानते हैं, जबकि ऐसा नहीं है। आंकड़ों के अनुसार पिछले 25 वर्षों में सीवीडी के मामले 34 फीसदी तक बढ़े हैं। इस वजह से असमय मृत्यु और कम उम्र में शारीरिक अक्षमता का खतरा भी बढ़ा है।

आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की पहुंच लगातार बढ़ रही है। बावजूद इसके कई गंभीर रोगों के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है, इन्हीं में से हैं कार्डियोवैस्कुलर डिजीजेज (सीवीडी)। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पूरे विश्व में यह मृत्यु का सबसे प्रमुख कारण है। पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया द्वारा प्रस्तुत 2016 की रिपोर्ट के अनुसार पिछले 26 वर्षों में भारत में सीवीडी के मामलों में 34 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

क्या है सीवीडी

हमारा हृदय जटिल मांसपेशीय अंग है, जो शरीर के सभी भागों को खून पंप करता है। हृदय से एक मोटी नाड़ी निकलती है, जिसे एओरटा कहते हैं, इसकी शाखाएं शरीर के विभिन्न भागों में रक्त और ऑक्सीजन पहुंचाती हैं। कार्डियोवैस्क्युलर या सर्कुलरी सिस्टम (परिसंचरण तंत्र) हृदय, धमनियों, शिराओं और रक्त नलिकाओं से बना होता है। इनसे जुड़ी कोई भी समस्या सीवीडी कहलाती है। इस तरह सीवीडी, हृदय और रक्त नलिकाओं से जुड़े कई रोगों का समूह है, इसके कई रूप हैं, जैसे -

कोरोनरी हार्ट डिजीज - यह रक्त नलिकाओं का रोग है। ये नलिकाएं दिल की मांसपेशियों को खून की आपूर्ति करती हैं।
सेरीब्रोवैस्क्युलर डिजीज -उन रक्त नलिकाओं का रोग है, जो मस्तिष्क को खून की पूर्ति करती हैं।
पेरीफेरल आर्टिरियल डिजीज - रक्त नलिकाओं का रोग, जो बाहों और पैरों को खून की पूर्ति करती हैं।
डीप वेन थ्रोम्बोसिस और पल्मोनरी एम्बोलिज्म - पैर की रक्त नलिकाओं में खून के थक्के जम जाना, जो हृदय और फेफड़ों तक पहुंच सकते हैं।

नजरअंदाज न करें इन संकेतों को-
-छाती में बेचैनी और भारीपन महसूस होना।
-छाती में दर्द के साथ सांस फूलना।
-अत्यधिक पसीना आना।
-बांहों का सुन्न हो जाना।
-बोलने में जुबान लड़खड़ाना।
-हृदय की धड़कनें असामान्य हो जाना।
-लगातार चक्कर आना, थकान या कमजोरी।
-जी मिचलाना, अपच, सीने में जलन या पेट दर्द
-गले या जबड़ों में दर्द होना।
-पंजे, पैर और टखनों का सूज जाना।
-अचानक चक्कर आना, चलने में समस्या होना।
-एक ओर बांहों या पैरों में कमजोरी आ जाना।
-लंबे समय से चली आ रही खांसी, जिसमें सफेद या गुलाबी कफ आता है, उस पर भी ध्यान दें।

कारण-
-तनाव कार्डियोवैस्क्युलर डिजीज की आशंका को 15-20 प्रतिशत बढ़ा देता है।
-कोलेस्ट्रॉल का बढ़ना और मोटापा हृदय तंत्र पर बुरा असर डालते हैं।
-धूम्रपान, धमनियों की दीवारों को हानि पहुंचाकर सीवीडी के खतरे को 3-6 गुना बढ़ा देता है।
-मांसाहार, तली चीजें, फास्ट फूड और ज्यादा नमक व चीनी खाना भी नुकसान पहुंचाता है।
-आनुवंशिक कारण। परिवार में इस बीमारी का इतिहास है तो सावधानी बरतना जरूरी है।
-शारीरिक सक्रियता की कमी का हृदय, धमनियों, और शिराओं पर बुरा असर पड़ता है।
-मधुमेह भी सीवीडी के खतरे को बढ़ाता है।

उपचार व दवाएं-
रोग का उपचार इस पर निर्भर करता है कि रोग कितना गंभीर है। हृदय व परिसंचरण तंत्र कितने क्षतिग्रस्त हुए हैं। कईबार सर्जरी भी की जाती है।

एंजियोप्लास्टी- प्राथमिक एंजियोप्लास्टी में रक्त नलिकाओं में जमे क्लॉट को निकालकर रक्त के प्रवाह को ठीक करते हैं। जरूरत होने पर एडवांस एंजियोप्लॉस्टी की जाती है, जिसमें धमनियों में रक्त के प्रवाह को सुधारने के लिए स्टेंट डाला जाता है।
बायपास सर्जरी-  रक्त संचार को सुधारने के लिए बायपास सर्जरी भी की जाती है, जिसमें सर्जरी के द्वारा रक्त नलिकाओं को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थापित किया जाता है।
एऑरटिक वॉल्व रिप्लेसमेंट- अगर हृदय का कोई वॉल्व ठीक से काम नहीं कर रहा है तो इसे बदलने के लिये सर्जरी जरूरी है। इस वॉल्व को निकालकर उसके स्थान पर कृत्रिम वॉल्व लगा दिया जाता है।
हृदय प्रत्यारोपण (हार्ट ट्रांसप्लांट)- इसमें बीमार या क्षतिग्रस्त हृदय को निकालकर उसके स्थान पर स्वस्थ हृदय को लगा दिया जाता है। इस प्रक्रिया का उपयोग अंतिम उपचार के रूप में किया जाता है। इसमें उन लोगों का हृदय लिया जाता है, जिन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया हो। इसे डोनर के शरीर से निकालने के बाद छह घंटे तक में प्रत्यारोपित करना जरूरी है। इस सर्जरी के सफल होने की संभावना 30 प्रतिशत होती है।
कार्डिएक पेसमेकर- हृदय की सामान्य धड़कनें प्रति मिनट 60-90 होती हैं। एरिथमिया से पीड़ित लोगों में धड़कनें आसामान्य रूप से कम होकर 30-40 हो जाती हैं। कईलोगों में 3-4 सेकेंड के लिए धड़कनें रुक जाती हैं। रोगी चक्कर खाकर गिरने लगता है। ऐसे रोगियों के लिए कार्डिएक पेसमेकर वरदान है। आधुनिक लीडलेस पेसमेकर, पारंपरिक पेसमेकरों की तुलना में बहुत बेहतर हैं, इसकी सफलता दर लगभग 99 प्रतिशत होती है।
क्लॉट डिजॉल्विंग ड्रग्स- कुछ दवाओं से धमनियों की ब्लॉकेज को खोलने का प्रयास किया जाता है। इन दवाओं को 4-5 घंटे के भीतर ही दिया जाना चाहिए, उसके पश्चात ये कारगर नहीं होती हैं।
स्टेंट रिट्रीवर- यह स्ट्रोक उपचार की नईतकनीक है, इसमें पतले कैथेटर और वायर के द्वारा मस्तिष्क से ब्लड क्लॉट निकाले जाते हैं तथा ब्लॉक हो चुकी रक्त नलिकाओं को खोला जाता है। नेशनल स्ट्रोक एसोसिएशन के अनुसार स्ट्रोक ठीक होने के बाद भी सावधानी रखें, क्योंकि दोबारा इसकी चपेट में आने का खतरा बहुत अधिक होता है।

हमारे विशेषज्ञ: डॉ. संजय कुमार, निदेशक, कार्डियोलॉजी, फोर्टिस एस्कार्ट्स हॉस्पिटल, फरीदाबाद। डॉ. सुब्रत अखौरी, एसोसिएट डायरेक्टर, कार्डियोलॉजी, एशियन हॉस्पिटल, फरीदाबाद।

सीवीडी और हृदय रोग में है यह अंतर-
सीवीडी में हृदय और परिसंचरण तंत्र से जुड़े सभी रोग सम्मिलित हैं, इसलिए इनका दायरा बहुत विस्तृत है। कार्डियो यानी हृदय और वैस्क्युलर यानी रक्त धमनियां। सीवीडी में बीपी और स्ट्रोक भी शामिल हैं। हृदय रोग में वही बीमारियां आती हैं, जो सीधेतौर पर हृदय और उसकी कार्यप्रणाली को प्रभावित करती हैं। अधिकतर हृदय रोग, सीवीडी का एक भाग हैं, लेकिन हृदय से जुड़ी कुछ समस्याएं, जो हृदय का आकार बढ़ने या मांसपेशियों में खराबी आने के कारण होती हैं, उन्हें सीवीडी में सम्मिलित नहीं किया जाता है। बच्चों में जन्मजात विकृतियां जैसे हृदय में छेद होना, दिल का बड़ा या छोटा होना भी सीवीडी नहीं है।

 ये उपाय करेंगे बचाव-
-लाल मांस से परहेज करें। फल व सब्जियां अधिक खाएं।

- खाना पकाने के लिए सरसों, जैतून या मूंगफली का तेल इस्तेमाल में लाएं।

- तलने के बाद बचे तेल को बार-बार तलने के लिए इस्तेमाल न करें। इसमें ट्रांस फैट की मात्रा घातक स्तर तक बढ़ जाती है।

- हर रोज कम से कम 30 मिनट व्यायाम करें व टहलें।
-वजन न बढ़ने दें। अगर बढ़ गया है तो उसे कम करने का प्रयास करें।

- तनाव न लें। ध्यान करें या कोई हॉबी बना लें, जो तनावमुक्त रखने में मदद कर सकती है।
-रक्तदाब को नियंत्रित रखें।

- नमक का सेवन कम करें।

- धूम्रपान और शराब का सेवन न करें।

-डायबिटीज है तो रक्त में शर्करा के स्तर को काबू रखें।

-परिवार में किसी को सीवीडी रही है, तो नियमित जांच कराएं।

-20 के बाद ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल और वजन की नियमित जांच कराएं। 40 की उम्र पार कर चुके लोगों को स्ट्रेस टेस्ट भी कराने चाहिए।

क्या कहते हैं आंकड़े-
-जर्नल ऑफ द अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार विश्व के करीब 27 फीसदी वयस्क ब्लड प्रेशर की समस्या से ग्रस्त हैं।
-चीन के एक अध्ययन के अनुसार रोजाना 4-5 घंटे टीवी देखने वालों में हृदय रोगों की आशंका 27 फीसदी तक बढ़ जाती है।
-डब्ल्यूएचए की 2016 में प्रकाशित, ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी के अनुसार, 15-49 की आयु वर्ग के 22 प्रतिशत लोगों की मृत्यु का कारण कार्डियोवैस्क्युलर डिजीज हैं।
-अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार गंभीर डिप्रेशन से पीड़ित लोगों में कोरोनरी आर्टरी डिजीज (सीएडी) का खतरा 64 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।
-डब्ल्यूएचओ के अनुसार, 2016 में सीवीडी रोगों से 1 करोड़ 79 लाख लोगों की मृत्यु हुई थीं, जो कि कुल वैश्विक मौतों का 31 प्रतिशत था। इसके कारण होने वाली कुल मौतों में से 85 प्रतिशत हार्ट अटैक और स्ट्रोक के कारण हुई थीं।

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