कोहिनूर की ये है असली कहानी

कोहिनूर की ये है असली कहानी

PUBLISHED : Apr 21 , 12:48 PMBookmark and Share

कोहिनूर की ये है असली कहानी
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कोहिनूर के हक को लेकर चल रहे विवाद के संदर्भ में ब्रिटिश इतिहासकार एंड्रयू राबर्टस ने सन् 2015 में लिखा था कि इस हास्यास्पद मामले से जो लोग जुड़े हैं उन्हें अच्छी तरह समझ लेना चाहिए ककि कोहिनूर रखने के लिए सबसे श्रेष्ठ स्थान ब्रिटिश क्राउन ज्वेल्स् है, क्योंकि ब्रिटेन तीन सदी तक भारत के हरेक मामले में जुड़ा था। उसी कारण भारतीय उप खंड में आधुनिकीकरण हुआ, विकास हुआ, जनता की रक्षा हुई, कृषि में प्रगति हुई, भाषाई एकता मजबूत हुई और अंततोगत्वा लोकतंत्र की स्थापना हुई। 
एंड्रयू राबर्टस के इस वर्णन को सीधी-सहज भाषा में समझना हो तो हम यूं कह सकते हैं कि भारत एक अनपढ़, गंवार, खेती-बाडी की बिना समझ वाला एक सामंतवादी देश था और अंग्रेजों ने आकर 3 सौ साल तक जो मेहनत की, उसके कारण भारत एक सक्षम राष्ट्र बनने में कामयाब हुआ । उसके ईनाम के रूप में हमें कोहिनूर मिला है। अब उस पर कोई दावा करे या हक जताए तो वो सभी मूर्ख हैं। 
मजे की बात ये है कि अंग्रेज लूटी हुई वस्तुओं को भी नजराने की बताते हैं और फिर लूट की शिकायत करने वाले को मुर्ख बताकर उसे अपमानित करने की कोशिश करते हैं, यह बेहद ही अफसोस की बात है। अफसोस इस बात पर भी है कि भारत सरकार ने भी धूर्त और शातिर अंग्रेजों की बात को मानकर कोहिनूर से अपना दावा छोड़ दिया है। यहां आम जनता की दृष्टि से सोचें तो डायमंड के मामले में अंग्रेजों की बात मान लेना, मोदी सरकार का भोलापन है या दूसरे किसी दबाव के आगे सरकार ने उनकी बात मान ली है और कोहिनूर से अपना दावा छोड़ दिया है। यह बात दीवार पर लिखी इबारत की तरह साफ है कि अंग्रेज साम्राज्यवादी थे? हरेक उप खंड में जो जो राष्ट्र समृद्ध होते हुए आंतरिक रूप से असंगठित थे, वहां-वहां व्यापार के नाम दाखिल होने वाले अंग्रेज ही थे!  
अभी तक जिस कोहिनूर पर भारत अपना हक-दावा जता रहा था, वो अचानक भेंट में कैसे तब्दील हो गया? इसका सही जवाब तो मोदी सरकार ही दे पाएगी, परंतु कोहिनूर के मामले में पूरे इतिहास को खंगालें तो पता चलता है कि यह बेशकीमती कोहिनूर मूल रूप से भारतीय राजाओं का ही था। मालवा के राज परिवार का यह डायमंड सबसे पहले इब्राहिम लोदी ने हड़प लिया। लोदी के पास से यह कोहिनूर बाबर के पास गया और उसके बाद विभिन्न मुगल शासकों के कब्जे में रहा। मुगल शासक उसे जैसे अपने पूर्वजों से मिली वारिसाना संपत्ति समझकर देते रहे और आखिर में यह कोहिनूर घूमते-फिरते अफगानिस्तान पहुंच गया। मुगलों में भी अंदर ही अंदर साजिश,षडयंत्र और परस्पर खौफ था। 18 वीं सदी में नादिर शाह ने दिल्ली पर चढ़ाई कर सुल्तान मोहम्मद को पराजित कर दिया और उससे कोहिनूर हथिया लिया। इतिहासविद् एन.बी.सेन ने अपनी पुस्तक 'द ग्लोरियस हिस्ट्री आॅफ कोहिनूर: द ब्राइटेस्ट ज्वेल इन ब्रिटिश क्राउन' में लिखते हैं,''काबुल में अपने भाइयों से बचने के लिए अहमद शाह का वारिस शाह शुजा दुर्रानी भारत की तरफ भागा और उसने पंजाब के तत्कालीन महाराजा रणजीतसिंह से शरण मांगी। इस मेहरबानी के बदले दुर्रानी ने महाराजा को कोहिनूर भेंट किया। 1840 में महाराजा के निधन के बाद उनके तीन बड़े बेटे उचित शासन नहीं कर सके और एक के बाद एक दम तोड़ते गए। तत्पश्चात 1843 में दुलीपसिंह को राजा बनाया गया, तब उनकी उम्र मात्र 5 वर्ष थी। 1849 में अंग्रेजों ने पंजाब को कब्जे में लेने के लिए आक्रमण किया, तब दुलीपसिंह की उम्र मात्र 11 वर्ष थी। दुलीपसिंह के पास इस उम्र में शरणागति के सिवाय कोई दूसरा रास्ता न था। उन्हें सत्ताच्युत कर ब्रिटेन ले जाया गया। कोहिनूर सहित सारा माल-असबाब अंग्रेजों ने उस वक्त लूट लिया गया परंतु चालाक अंग्रेजों ने बाद में दुनिया को भरमाने के लिए यह कहानी प्रचारित की कि दुलीपसिंह ने स्वेच्छा से, राजी-खुशी यह कोहिनूर इंग्लेंड की महारानी को भेंट किया। अंग्रेजों के इस प्रचार को दुनिया ने स्वीकार कर लिया और इतिहास में यह दर्ज हो गई कि महाराजा रणजीतसिंह के वारिसों ने सबसे कीमती कोहिनूर इंग्लेंड की महारानी को भेंट कर दिया। 
लूट को भेंट निरूपित करने की अंग्रेजों की चाल सफल हो गई और आज ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला मोदी सरकार ने भी अदालत में कह दिया। सवाल यह है कि क्या कोई इस ऐतिहासिक तथ्य कोई जानता नहीं था? जानता था तो फिर उसे वापस लाने के बारे में भाषण देकर जनता को गुमराह करते रहा? मान लो कि पता नहीं था पर अब पता चल गया तो सवाल यह भी है क्या कोई 11 वर्ष का बच्चा किसी ब्रिटिश महारानी को कोहिनूर जैसी बेशकीमती भेंट दे सकता है?cb

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