स्टेम सेल्स से बने ये अनोखे ‘जीवित रोबॉट’

स्टेम सेल्स से बने ये अनोखे ‘जीवित रोबॉट’

PUBLISHED : Mar 07 , 12:42 PMBookmark and Share



वैज्ञानिकों ने साइंस फिक्शन जैसा करिश्मा दिखाते हुए मेंढक के भ्रूण से ली गई कोशिकाओं को नए उपयोग के लिए ‘जीवित रोबॉट’ में बदल दिया है। ये एक मिलीमीटर चौड़े रोबॉट अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ सकते हैं, दवा जैसी किसी चीज को मरीज के शरीर में सटीक जगह पहुंचा सकते हैं और कट जाने पर खुद को दुरुस्त भी कर सकते हैं। सामूहिक रूप से कार्य करने वाले ये रोबॉट चल सकते हैं, तैर सकते हैं तथा भोजन के बगैर हफ्तों तक जीवित रह सकते हैं।

अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ वर्मोंट के कंप्यूटर वैज्ञानिक तथा रोबॉटिक्स विशेषज्ञ जोशुआ बोंगर्ड ने इन रोबॉट्स को ‘जीवित मशीन’ बताया है। बोंगर्ड के ही मार्गनिर्देश में यह रिसर्च संपन्न हुआ है। उन्होंने कहा कि ये न तो सामान्य रोबॉट हैं और न ही कोई जंतु। ये दरअसल ऐसे जीव हैं जिनकी प्रोग्रैमिंग की जा सकती है। ये विशुद्ध रूप से नए जीव-रूप हैं।
इन नए जीवों को वर्मोंट यूनिवर्सिटी के सुपरकंप्यूटर ने डिजाइन किया और टफ्ट यूनिवर्सिटी के जीव वैज्ञानिकों ने इन्हें असेंबल करने के बाद उनका परीक्षण किया। इस अध्ययन के सह-लेखक माइकल लेविन का कहना है कि जो काम मशीनें नहीं कर सकतीं वे कठिन कार्य भी ये रोबॉट आसानी से कर सकते हैं। इन दुष्कर कार्यों में विषैले रसायनों या रेडियो एक्टिव प्रदूषण का पता लगाना, समुद्र से सूक्ष्म प्लास्टिक एकत्र करना और धमनियों में जा कर प्लेक हटाना शामिल हैं।

पिछले कुछ समय से जीन संपादन तकनीकों का चलन बढ़ रहा है और कुछ जीवों के कृत्रिम रूप भी तैयार किए गए हैं, लेकिन यह पहला अवसर है जब जैविक मशीनों को डिजाइन किया गया है। वर्मोंट यूनिवर्सिटी के सुपर कंप्यूटर में रिसर्चरों ने नए जीव-रूपों के लिए हजारों डिजाइन तैयार किए। इनमें से कुछ डिजाइनों को परीक्षण के लिए चुना गया। इसके आगे का काम टफ्ट यूनिवर्सिटी की टीम ने किया। सबसे पहले इस टीम ने स्टेम कोशिकाओं को एकत्र किया जो ‘जीनोपस लेविस’ नामक अफ्रीकी मेंढकों की प्रजाति के भ्रूणों से निकाली गई थीं। गौरतलब है कि स्टेम कोशिकाएं विभिन्न किस्म की कोशिकाओं में विकसित होने की क्षमता रखती हैं। रिसर्चरों ने इन स्टेम कोशिकाओं को अलग-अलग कोशिकाओं के रूप में अलग करने के बाद उन्हें विकसित होने के लिए छोड़ दिया। रिसर्चरों ने सूक्ष्म फोरसेप और सूक्ष्म इलेक्ट्रोड की मदद से इन कोशिकाओं को काट कर सुपरकंप्यूटर द्वारा निर्धारित डिजाइन के अनुसार पुनः जोड़ा। नए रूपों में असेंबल होने के बाद ये कोशिकाएं आपस में मिल कर काम करने लगीं। इस तरह बने जीव संयोजित ढंग से हलचल करने लगे। त्वचा की कोशिकाओं ने आपस में जुड़ कर संरचना बनाई जबकि हृदय की मसल कोशिकाओं ने रोबॉट को आगे बढ़ने में मदद की।
गुलाबी बिंदुओं जैसे दिखने वाले जीनोबॉट्स में खुद की मरम्मत करने की भी क्षमता होती है। जब वैज्ञानिकों ने एक रोबॉट को काटा तो उसने खुद को ठीक कर लिया और आगे बढ़ता रहा। परीक्षणों के द्वारा रिसर्चरों ने दर्शाया कि जीनोबॉट एक साथ आगे बढ़ते हैं और गोलियों को लक्ष्य की ओर आगे खिसकाते हैं। बोंगर्ड ने कहा कि शरीर के भीतर दवाओं की सटीक डिलीवरी के लिए कंप्यूटर द्वारा डिजाइन किए गए जीवों के प्रयोग की दिशा में यह पहला कदम है।

अनेक तकनीकों में स्टील, कंक्रीट और प्लास्टिक का प्रयोग होता है। निस्संदेह इससे इनको सुदृढ़ता या लचीलापन मिलता है, लेकिन इनसे पर्यावरणीय और मानव स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। इसके अलावा सामान्य रोबॉट्स में एक समय के बाद क्षय होने लगता है जिसका पर्यावरण और स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ता है। जीनोबॉट पर्यावरण-अनुकूल हैं और काम पूरा होने पर पूरी तरह नष्ट भी किए जा सकते हैं।

जीनोबॉट्स कोशिका के विज्ञान को गहराई से समझने में भी वैज्ञानिकों की मदद कर सकते हैं। रिसर्चरों का कहना है कि यदि हम मांग के अनुसार 3डी जैविक रूप बना लें तो जन्म संबंधी गड़बड़ियों को दूर कर सकते हैं, ट्यूमर की रिप्रोग्रैमिंग कर उसे सामान्य टिशू में बदल सकते हैं तथा गंभीर चोटों की स्थिति में अंगों को दोबारा उगा भी सकते हैं।
डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं
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